रविवार, 14 सितंबर 2014

साहित्य अकादेमी से पुरूष्कृत कवि लक्ष्मण का गजल संग्रह 'बात अलग है' का लोकार्पण और चर्चा

साहित्य और कलाएं मानसिक स्तर को ऊपर ले जाती है: कृष्ण कल्पित जयपुर: लब्ध प्रतिष्ठित कवि और दूरदर्शन केंद्र के उप महानिदेशक कृष्ण कल्पित ने कहा है कि कवि लक्ष्मण शायरी के मर्म को समझते हैं और उन्होंने कई तरह के प्रयोग किए हैं। उनकी गज़लों में रवानी है । गजल दरअसल फिक्र और ख्याल की विधा है। इनकी गज़लों में गीतों का भी रंग है एवं आध्यात्मिकता का पुट लिए हुए हैं । कल्पित यहाँ पिंक सिटी प्रेस क्लब के सभागार में राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में साहित्य अकादमी से पुरष्कृत वरिष्ठ कवि लक्ष्मण के गजल संग्रह ‘’बात अलग है’’ के लोकार्पण के बाद हुई चर्चा में मुख्यअतिथि के रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहाकि साहित्य और कलाएं मानसिक स्तर को ऊपर ले जाती है । आध्यात्मिकता या मोक्ष पाने के लिए कविता लिखने के वे पक्षधर नहीं हैं । कविता या शायरी मनुष्य के अकेलेपन के साथी हैं और जीवन को हौसला देते हैं एवं राष्ट्र का निर्माण करते हैं । उन्होंने कहा कि उर्दू हिन्दी दो बहनें हैं और एक जबान है। इसको अलगाने वाली कार्यवाहियों से भाषा नष्ट होती है । मीर ने उर्दू भाषा को मानक दिया और गालिब ने उसमें नई रंगत पैदा की।उन्होंने मनुष्य की जटिलताओं और निराशाओं को अपने दीवान में व्यक्त किया है।अमीर खुसरों, दाग,फैज,नासिर,काजमी, फिराक ने उर्दू को समृद्ध बनाया । इसकी एक लंबी रवायत है। आज लिखने वाले इतने हो गए की अच्छी और बुरी शरई में फर्क करना मुश्किल हो गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक एवं वरिष्ठ कवि हरीश करमचंदानी ने कहा कि वर्तमान जहां सांप्रदायिकता मुंह बाए खड़ी है,मानवता की भावना खत्म हो रही है,निर्ममता,बर्बरता क्रूरता का समय है,प्यार जैसे अनमोल भावों को कुचला जा रहा है तब लक्ष्मण जैसे कवि प्यार की बात कर रहे हैं। यह समाज और कविता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होने कहा कि ऐसे समय में निर्दोष मन के साथ कविता को रेखांकित करना मुश्किल होता है। कवि सस्ती लोकप्रियता के प्रति स्वयं तो जागरूक है ही वरन कविता के जरिये ओरों को भी सावधान करता है। प्रतिष्ठित गीतकार लोकेशकुमार सिंह ‘साहिल’ ने कहा कि कवि लक्ष्मण के संग्रह की गज़लों से उनके दोहे अधिक अच्छे हैं।उनकी गज़लों का खास फ्लेवर है।भाषा बेहद खास किस्म की है और उसमें क्लिष्ट शब्दों की बजाय सरल आम फहम की भाषा का प्रयोग हुआ है। जहां तक रचनाओं के कंटेन्ट की बात है तो आम लोगों के मन की बात है। इस संदर्भ में भवानीप्रसाद मिश्र का उल्लेख किया जो कहा करते थे कि जैसा दिखता है वैसा दिख और वैसा लिख। कवि लक्ष्मण कि गज़लों के शे’र देखने से लगता है कि वे किसी वाद या विचार से प्रभावित नहीं लगते । इनमे आम आदमी कि अभिव्यक्ति है। कवि कविता को पूजा का संसार मानते हैं। जाने माने कवि एवं आलोचक सवाईसिंह शेखावत ने संग्रह की कई गज़लों को उद्धृत करते हुए कहा कि इनकी रेंज जीवन के सभी पक्षों को छूती है। कवि ने बाजारवाद की ओर इंगित करते हुए लिखा है-‘आज पानी दाम पर बिकने लगा है, कल हवाओं की बारी याद रखना’ और ‘हरे भरे खेतों में अब टावर उग आए हैं।’ कवि अभिव्यक्ति के संकट पर चुप नहीं बल्कि मुखर होकर लिखता है- ‘जिस जगह इजहार पर तले लगे हैं,बस वहीं क्रांति का मूल होगा।‘निजता से लेकर समाज के व्यापक परिप्रेक्ष्य तक दु:ख-सुख,आशा-निराशा, उमंग-उत्साह इनकी गज़लों में आया है । उन्होने एक जगह इंसान की फितरत पर लिखा है- ‘शख्स वो कितना अच्छा है,हर झगड़े से बचता है।‘ कवि ने जीवन का शायद ही कोई पक्ष छोड़ा हो।गजलकार जीवन की संवेदनाओं को खोजता है। उनके दोहे भाव और भाषा के स्तर पर सोचने को विवश करते हैं। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि गोविंद माथुर ने और वहीं क्रांति आभार संघ के प्रांतीय महासचिव ओमेन्द्र ने व्यक्त किया। रिपोर्ट -फारूक आफरीदी

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने अभी पढ़ी नहीं है। अगर ऐसा है तो प्रगतिशील लेखक संघ को कार्यक्रम के आयोजन के बारे में सोचना चाहिए था। आप स्वयं भी संघ के अध्यक्ष मण्डल के सदस्य हैं । हमें तो कार्यक्रम में आने की सूचना मात्र मिलती है ।

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